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Wednesday, 25 September 2013

आतंकवाद एक समस्या


हर बार चली एक नयी गोली ,
हर बार नयी एक जान गयी ,
और लाल रंग गिरा धरती पर ,
कि मना होली का रॊज पर्व |

हर बार बनी नयी विधवा ,
हर बार बाप ने खोया पुत्र ,
अगिनत अश्रु ढले अनंत पर ,
धुला नहीं वह लाल रंग |

हर बार नीर से भरे दुर्ग ,
जब जब देखा वो नारसहार ,
हर बार करुण एक आह बनी ,
जब सुनी मौत कि नयी कराह |

मिला नहीं किसे पति- पुत्र ,
और निज को नहीं मिला भ्राता ,
और बिछड़ गयी सास से बहु ,
जब भी बहा यह लाल लहू |

हर बार सोचता हु यह प्रश्न ,
क्यों तोड़ रहे वे खुद का अंश ,
हर बार मिला एक ही उत्तर ,
वहा इंसानियत खड़ी बनी निरुत्तर |

दुःख हुआ मुझे जब सोचा में ,
वे रॊज मचाते है उत्पात ,
और हिला रहे है नीव देश कि ,
जब पड़ोसियों से बन रही न बात |

हर बार समझता रहा यह कि ,
कल होगा इस सब का अंत ,
हर बार निराशा हाथ लगी ,
सब भूल खड़े थे धर्मपंत |

क्यों उनकी बाते करू याद ,
और होता रहू इस तरह त्रस्त ,
जब देख न सकते वे अंधे ,
हो रहा उनकी जाती का अस्त |

डॉ सुनील अग्रवाल 



Wednesday, 21 August 2013

ग़रीबी





मै एक ऐसी कहानी हू,

जो सबकी जानी पहचानी हू,

झुल्फ मेरी उम्मिदो की बनी है,

जो हर हवा के झोके से बिखर जाती है,

बिन्दिया के नाम पर रोज,

लहू के छीटे माथे पर उड़ जाते है,

होटो की लाली की जगह,

भूख की ताज़गी हर समय नज़र आती है,

आखो के झरोको मे,

भय और आतंक का तांडव दिखाई देता है,

खिलखिलाकर आती हसी की बजाए,

मौन खड़े सन्नाटे की अहाट आती है,

ओडनी के चंद धागो को छोड़कर,

बची हुई लाज गिधो के पंजो मे नज़र आती है,

पक्समो पर बसी हुई झुरिया ही,

मेरी जवानी की बची हुई अमानत है,

सर पर सफेद होते बाल ही,

मेरे बडनेकी निशानी है,

अगर अब भी समझ पाए तो,

कुछ आसू बहा देना,

और इस अभागन को,

ग़रीबी कहकर गले लगा लेनाII I



By-

Dr Sunil Agrawal